मोहम्मद रफ़ी की पुण्य तिथि पर अजयमेरू प्रेस क्लब की श्रद्धांजलि सभा में प्रस्तुत स्वरचित नज्म

 

मोहम्मद रफ़ी साहब  की पुण्य तिथि पर एक श्रद्धॉंजलि 

हे रफी, क्या तहरीर करूं तेरी दास्तां लफ्ज़ नहीं मिलते
आंसू ही बयां कर जाते हैं मेरी बेकसी का फसाना

सुरों के मसीहा, तू ये अंदाजे बयां कहां से लाया
हर होठ पे गीत तेरे, पर उन्हें हूबहु कोई न गा पाया

आज तेरे गीत तुझे ही सुनाने आये हैं
तुने जो सपने दिखायें उन्हीं में खो जाने को हम आये हैं

कौन कहता है कि तू इस जमीं को छोड़ कर     कहीं चला गया है

हमें तो लगता है कि तू हर दिल में बस गया है

दिल में बुलाकर, तुझे कोई रुख्सत न कर सकेगा
मुश्किल है तेरा लौट के जाना किसी भी दिल से

न जाने कितनी फिल्में आई और गीत, नई आवाज के
लेकिन बच्चा-बच्चा आज भी गा रहा है गीत तेरे नाम के

आइना-ए-दिल में जो देखूं मुस्कान तेरी
होश खो जाते हैं
तेरी आवाज सुन कर तो हम मदहोश हो जाते हैं

 हे रफी, तुम क्या गये आफताब गुरूब हो गया
जुगनुओं की रौशनी ही, हमारा नसीब हो गया।

शायर- प्रमोद कुमार शर्मा

मोबाइल 9829971919 अजमेर

Post Author: pramod kumar sharma