जन्म दिन की 66 वीं वर्षगांठ पर रचित

आज मेरी ज़िन्दगी ने दो-दो छक्के एक साथ लगाये हैं

कैच होते हुए कई बार बचे, आज बाउंडरी पार पहुँचाये हैं

 

पत्नी चाहे, जिन्दगी की मेरी लम्बी पारी, मैं नॉट आउट रहूँ

खुशियाँ मिले खूब घर के भीतर, न कभी देर तक आउट रहूँ

 

उसका मतलब फूल बनकर महकूं, खाद पानी की चाह न करूं

ग्वार पाठे का जूस पिउं और स्वस्थ मुस्कान बिखेरा करूँ

 

इसी फारमूले से जी रहा हूँ

लम्बे जीवन की कामना कर रहा हूँ

 

मुफलिसी के दौर में तोहफे लेने और देने के बहुत मौके आते थे

ऐसे में हम एक मात्र जागीरे दिल से ही काम चला आते थे

मुश्किलों का दौर था वह जब मुश्किल थी बस और ट्रेन

आप सब की दुआ से अब ज़िन्दगी में है प्लेन ही प्लेन

 

पहले मेरी ज़ुल्फें थी काली, हाँ, ये ज़ेब होती थी खाली

आज हर ओर चांदी, वक्त ने गज़ब करवट बदल डाली

एक बार मुफलिसी में उन्होंने तोहफा माँग लिया

ऐसा लगा जैसे कटे हुए पे गरम नमक डाल दिया

 

इतनी सामर्थ कभी नहीं रही कि इनकी फरमाइशें पूरी कर सकूं

अब वो मांगे स्वस्थ ज़िंदगी, बताओ, जहाँ से संजीवनी ला सकूँ

 

बीती हुई ज़िन्दगी की रील चलायें तो यादों के कई बबंडर आते हैं

सुकून ज़िन्दगी का मिल जाता है, जब हम प्रेस क्लब मे आते हैं

– प्रमोद कुमार शर्मा